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सोमवार, 24 अगस्त 2026

ख़ामोश संवाद

 

उस दिन
जब तल्लीन थे
ज़मीन पर गिरे सूखे पत्ते
अनुवादित करने में
तुम्हारे कंपकंपाते अधरों
के अनबोले बोलों को,

हवा के भी
कान खड़े हो गए थे
सुनने को

याद है?

वृक्ष भी
थोड़ा झुक गया था,
शायद
वह भी जानना चाहता था
तुम्हारे मौन में
छिपे उस प्रेम का
अर्थ।

और मैं
तुम्हारे अधरों की
उस कंपकंपी को
अपनी धड़कनों में
सहेज रहा था।

क्या गौर किया था तुमने

बेंच पर मेरी उंगलिया

तुम्हारी उंगलियो से

बिना स्पर्श के भी

कंपकपाते हुए

कुछ अनकहा कह रही थी 

 

उस दिनजुबान से
कुछ भी तो नहीं कहा था हमने,
फिर भी
न जाने क्यों
आज तक
वह ख़ामोशी
बोलती है।

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम


निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम

अस्फुट-स्वर-बोध करा दो ना चुप रहो आज तुम

साक्षात मगर हो

दिवा-सपन सी

साहचर्य तुम्हारा

पूस-कपन सी

लजायमान स्पर्श-कामना को स्पर्श-बोध चाहिये

कल-कल-निनाद साधों को ना अवरोध चाहिये

बाधित आतुरता के कोमल भाव सहो आज तुम

निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम

भ्रमर गुंजन सी

श्वासों की लहरी

सम्पूर्ण कायनात

शायद है ठहरी

अनकहे सन्देशों ने जब सब कुछ कह डाला है

फिर क्यूँ इन मृद अधरों पर चुप्पी का ताला है

सागर-मिलन को आतुर लहरों सी बहो आज तुम

निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम